Dhanvantarishwar and Vaidyeshwar Kund Kashi (भगवान् श्रीधन्वन्तरि का पौराणिक प्रादुर्भाव, काशी में अवतार तथा श्रीधन्वन्तरीश्वर एवं वैद्येश्वरकुण्ड का माहात्म्य)

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भगवान् श्रीधन्वन्तरि का पौराणिक प्रादुर्भाव, काशी में अवतार तथा श्रीधन्वन्तरीश्वर एवं वैद्येश्वरकुण्ड का माहात्म्य

श्रीमद्भागवत, हरिवंश, विष्णुपुराण, सुश्रुतसंहिता तथा श्रीस्कन्दमहापुराण के काशीखण्ड में वर्णित

भगवान् श्रीधन्वन्तरि भारतीय पौराणिक परम्परा में अमृत, आरोग्य और आयुर्वेद के दिव्य अधिष्ठाता हैं। समुद्रमन्थन से उनका आविर्भाव, भगवान् श्रीविष्णु का अंशस्वरूप होना, काशी के राजवंश में उनका अवतरण तथा महर्षि सुश्रुत से सम्बद्ध उनकी चिकित्सा-परम्परा—इन सभी का वर्णन प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। परमपावनी काशीपुरी में उनका सम्बन्ध केवल राजवंश और आयुर्वेद तक ही नहीं, अपितु श्रीस्कन्दमहापुराण के काशीखण्ड में वर्णित धन्वन्तरीश्वर महालिङ्ग तथा वैद्येश्वरकुण्ड से भी स्थापित होता है। विविध ग्रन्थों की कथाओं और तीर्थों के नामों को यथावत् रखते हुए उनके इस महनीय चरित्र का निरूपण किया जाता है।

क्षीरसागर के मन्थन से अमृतकलशधारी भगवान् धन्वन्तरि का आविर्भाव

प्राचीनकाल में जब देवताओं और दानवों ने अमृतप्राप्ति के लिए क्षीरसागर का मन्थन किया, तब मन्दराचल मन्थनदण्ड और वासुकि नाग रज्जु बने। भगवान् नारायण ने कूर्मरूप से पर्वत को आधार दिया। उस महामन्थन से अनेक दिव्य पदार्थ प्रकट हुए और अन्त में एक अद्भुत पुरुष अमृत से परिपूर्ण कलश धारण किए हुए समुद्र से उदित हुए। श्रीमद्भागवत महापुराण में उनके दिव्य विग्रह का इस प्रकार वर्णन हुआ है—

अथोदधेर्मथ्यमानात् काश्यपैरमृतार्थिभिः । उदतिष्ठन्महाराज पुरुषः परमाद्भुतः ॥३१॥ दीर्घपीवरदोर्दण्डः कम्बुग्रीवोऽरुणेक्षणः । श्यामलस्तरुणः स्रग्वी सर्वाभरणभूषितः ॥३२॥ पीतवासा महोरस्कः सुमृष्टमणिकुण्डलः । स्निग्धकुञ्चितकेशान्तसुभगः सिंहविक्रमः । अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद् वलयभूषितः ॥३३॥ स वै भगवतः साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भवः । धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ॥३४॥ तमालोक्यासुराः सर्वे कलशं चामृताभृतम् । लिप्सन्तः सर्ववस्तूनि कलशं तरसाहरन् ॥३५॥

— श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध ८, अध्याय ८, श्लोक ३१–३५

श्रीशुकदेवजी महाराज परीक्षित से कहते हैं कि कश्यप के पुत्र देवता और दानव जब अमृत के लिए समुद्र का मन्थन कर रहे थे, तब समुद्र से एक परम अद्भुत पुरुष प्रकट हुए। उनकी भुजाएँ दीर्घ और पुष्ट थीं; कण्ठ शङ्ख के समान सुन्दर, नेत्र अरुणवर्ण, शरीर श्यामल, अवस्था तरुण तथा वक्षःस्थल विशाल था। वे पीताम्बर, दिव्य माला, मणिकुण्डल और विभिन्न आभूषणों से विभूषित थे। उनके हाथ में अमृत से पूर्ण कलश था। वे भगवान् श्रीविष्णु के अंशांश से उत्पन्न, आयुर्वेद के ज्ञाता तथा यज्ञ में भाग प्राप्त करने वाले धन्वन्तरि नाम से प्रसिद्ध हुए। अमृतकलश को देखकर असुरों ने उसे बलपूर्वक ग्रहण कर लिया; उसके पश्चात् भगवान् नारायण की मोहिनीलीला और अमृत-वितरण का प्रसंग आता है। इस प्रकार धन्वन्तरि का अमृतकलशधारी स्वरूप स्वयं श्रीमद्भागवत में प्रत्यक्ष प्रमाणित है।

अग्निपुराण, महाभारत और वाल्मीकि रामायण में समुद्रजन्म का वर्णन

अग्निपुराण के तृतीय अध्याय में भगवान् धन्वन्तरि को भगवान् विष्णु और आयुर्वेद का प्रवर्तक कहा गया है। महाभारत के आदिपर्व में भी उनका अमृतधारी स्वरूप प्रकट होता है। वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के समुद्रमन्थन-प्रसंग में महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को आयुर्वेदमय पुरुष धन्वन्तरि के प्रादुर्भाव का वृत्तान्त सुनाते हैं। ग्रन्थों में उनके हाथ में कलश अथवा कमण्डलु होने का वर्णन मिलता है; विभिन्न पाठों में स्वरूप-विवरणों का कुछ अन्तर है, किन्तु समुद्रमन्थन, अमृत और आयुर्वेद से उनका सम्बन्ध सर्वत्र प्रधान रहता है।

ततो धन्वन्तरिर्विष्णुरायुर्वेदप्रवर्तकः । बिभ्रत्कमण्डलुं पूर्णममृतेन समुत्थितः ॥११॥

— अग्निपुराण, अध्याय ३, श्लोक ११

यहाँ धन्वन्तरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक तथा अमृतपूर्ण कमण्डलु सहित प्रकट होने वाला भगवान् विष्णु कहा गया है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत की अवतारपरम्परा और अग्निपुराण की आयुर्वेदपरम्परा में उनका स्वरूप परस्पर सम्बद्ध है।

हरिवंश में भगवान् धन्वन्तरि का अब्ज नाम और श्रीविष्णु से प्राप्त वरदान

महाभारत के खिलभाग हरिवंश के हरिवंशपर्व में धन्वन्तरि के समुद्रजन्म तथा पृथ्वी पर उनके पुनरवतरण की विशेष कथा कही गई है। महाराज जनमेजय की जिज्ञासा पर वैशम्पायनजी बताते हैं कि समुद्रमन्थन से उत्पन्न उस देवपुरुष को भगवान् विष्णु ने अब्ज कहा। उन्होंने भगवान् से यज्ञभाग और लोक में अपना स्थान माँगा। तब भगवान् ने उन्हें दूसरे जन्म में महान् यश, सिद्धियाँ और आयुर्वेद को आठ अङ्गों में व्यवस्थित करने का वरदान प्रदान किया।

धन्वन्तरेः सम्भवोऽयं श्रूयतां भरतर्षभ । जातः स हि समुद्रात्तु मथ्यमाने पुरामृते ॥१२॥ उत्पन्नः कलशात् पूर्वं सर्वतश्च श्रिया वृतः । अभ्यसन्सिद्धिकार्ये हि विष्णुं दृष्ट्वा हि तस्थिवान् ॥१३॥ अब्जस्त्वमिति होवाच तस्मादब्जस्तु स स्मृतः । अब्जः प्रोवाच विष्णुं वै तव पुत्रोऽस्मि वै प्रभो ॥१४॥ विधत्स्व भागं स्थानं च मम लोके सुरेश्वर । एवमुक्तः स दृष्ट्वा वै तथ्यं प्रोवाच तं प्रभुः ॥१५॥

— हरिवंश, हरिवंशपर्व, अध्याय २९, श्लोक १२–१५

द्वितीयायां तु सम्भूत्यां लोके ख्यातिं गमिष्यसि । अणिमादिश्च ते सिद्धिर्गर्भस्थस्य भविष्यति ॥१८॥ तेनैव त्वं शरीरेण देवत्वं प्राप्स्यसे प्रभो । चरुमन्त्रैर्व्रतैर्जाप्यैर्यक्ष्यन्ति त्वां द्विजातयः ॥१९॥ अष्टधा त्वं पुनश्चैवमायुर्वेदं विधास्यसि । अवश्यभावी ह्यर्थोऽयं प्राग्दृष्टस्त्वब्जयोनिना ॥२०॥

— हरिवंश, हरिवंशपर्व, अध्याय २९, श्लोक १८–२०

इस आख्यान में भगवान् विष्णु धन्वन्तरि से कहते हैं कि देवताओं का यज्ञविभाग पहले ही निश्चित हो चुका है, इसलिए उस समय नया भाग प्रदान नहीं किया जा सकता; किन्तु मनुष्यलोक में पुनर्जन्म लेकर वे ख्याति प्राप्त करेंगे, गर्भकाल से ही दिव्य सिद्धियों से सम्पन्न होंगे, उनका विधिपूर्वक पूजन होगा और वे आयुर्वेद को आठ विभागों में व्यवस्थित करेंगे। यही वरदान आगे काशी के राजवंश में उनके अवतार की भूमिका बनता है।

काशीराज धन्व के पुत्ररूप में धन्वन्तरि का अवतरण और अष्टाङ्ग आयुर्वेद का उपदेश

हरिवंश में वर्णित है कि काशी के राजा धन्व ने संतान की इच्छा से दीर्घकाल तक तपस्या करके उसी समुद्रज अब्जदेव की आराधना की। प्रसन्न होकर भगवान् ने उनसे वर माँगने को कहा। राजा ने प्रार्थना की कि वे स्वयं उनके पुत्र बनकर जन्म लें। इस प्रकार भगवान् धन्वन्तरि ने काशीराजवंश में अवतार ग्रहण किया और प्राणियों के रोगों का निवारण करने वाले लोकप्रसिद्ध वैद्यराज हुए।

द्वितीये द्वापरं प्राप्ते सौनहोत्रिः स काशिराट् । पुत्रकामस्तपस्तेपे धन्वो दीर्घं तपस्तदा ॥२२॥ प्रपद्ये देवतां तां तु या मे पुत्रं प्रदास्यति । अब्जं देवं सुतार्थाय तदाऽऽराधितवान्नृपः ॥२३॥ ततस्तुष्टः स भगवानब्जः प्रोवाच तं नृपम् । यदिच्छसि वरं ब्रूहि तत् ते दास्यामि सुव्रत ॥२४॥ भगवन् यदि तुष्टस्त्वं पुत्रो मे ख्यातिमान् भव । तथेति समनुज्ञाय तत्रैवान्तरधीयत ॥२५॥ तस्य गेहे समुत्पन्नो देवो धन्वन्तरिस्तदा । काशिराजो महाराज सर्वरोगप्रणाशनः ॥२६॥ आयुर्वेदं भरद्वाजात्प्राप्येह भिषजां क्रियाम् । तमष्टधा पुनर्व्यस्य शिष्येभ्यः प्रत्यपादयत् ॥२७॥ धन्वन्तरेस्तु तनयः केतुमानिति विश्रुतः । अथ केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः ॥२८॥ सुतो भीमरथस्यापि दिवोदासः प्रजेश्वरः । दिवोदासस्तु धर्मात्मा वाराणस्यधिपोऽभवत् ॥२९॥

— हरिवंश, हरिवंशपर्व, अध्याय २९, श्लोक २२–२९

इन श्लोकों का अभिप्राय है कि धन्वन्तरि ने महर्षि भरद्वाज से चिकित्सा-विद्या प्राप्त करके आयुर्वेद का अष्टाङ्ग विभाजन किया और उसे शिष्यों को प्रदान किया। उनकी परम्परा में पुत्र केतुमान्, पौत्र भीमरथ तथा आगे धर्मात्मा वाराणसीनरेश दिवोदास उत्पन्न हुए। यहाँ भगवान् के अवतार का लोककल्याणकारी प्रयोजन स्पष्ट है। वे केवल रोगों का विनाश करने वाले देवता नहीं, बल्कि चिकित्साविद्या को व्यवस्थित कर शिष्यों तक पहुँचाने वाले महान् उपदेशक हैं।

श्रीमद्भागवत में वासुदेवांश धन्वन्तरि तथा काशी के राजवंश का प्रमाण

श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध में काशीराजवंश की वंशावली में धन्वन्तरि का विशेष महत्त्व बताया गया है। भगवान् वासुदेव के अंशस्वरूप तथा स्मरणमात्र से आरोग्य प्रदान करने वाले देवता के रूप में उनकी स्तुति की गई है।

काश्यस्य काशिस्तत्पुत्रो राष्ट्रो दीर्घतमःपिता । धन्वन्तरिर्दीर्घतमस आयुर्वेदप्रवर्तकः । यज्ञभुग् वासुदेवांशः स्मृतमात्रार्तिनाशनः ॥४॥ तत्पुत्रः केतुमानस्य जज्ञे भीमरथस्ततः । दिवोदासो द्युमांस्तस्मात् प्रतर्दन इति स्मृतः ॥५॥

— श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध ९, अध्याय १७, श्लोक ४–५

श्रीशुकदेवजी के अनुसार काश्य से काशि, उनसे राष्ट्र और उनके वंश में दीर्घतमा उत्पन्न हुए। दीर्घतमा के पुत्र धन्वन्तरि आयुर्वेद के प्रवर्तक, यज्ञभाग के भोक्ता, भगवान् वासुदेव के अंश तथा स्मरणमात्र से पीड़ा का निवारण करने वाले हैं। उनसे केतुमान्, फिर भीमरथ और उसके बाद दिवोदास की परम्परा चलती है। विष्णुपुराण के चतुर्थ अंश, अध्याय ८ तथा ब्रह्माण्डपुराण के उपोद्घातपाद, अध्याय ६७ में भी धन्वन्तरि के आविर्भाव और राजवंश का वर्णन मिलता है। भिन्न पुराणों की वंशावलियों में कुछ पीढ़ियों के नाम और क्रम में पाठान्तर हैं; इसलिए उन्हें बिना भेद किए एक ही शब्दशः वंशावली नहीं मानना चाहिए।

काशीराज दिवोदास को धन्वन्तरि कहने वाली सुश्रुतसंहिता और महर्षि सुश्रुत का उपदेश

धन्वन्तरि की चिकित्सा-परम्परा का एक मूल आधार सुश्रुतसंहिता है। सूत्रस्थान के प्रथम अध्याय में भगवान् धन्वन्तरि का उपदेश बताकर आश्रम में विराजमान काशीराज दिवोदास को धन्वन्तरि सम्बोधित किया गया है। महर्षि सुश्रुत और उनके सहशिष्य उन आचार्य से प्राणियों की शारीरिक, मानसिक और आगन्तुक व्याधियों के निवारण के लिए आयुर्वेदविद्या का उपदेश माँगते हैं। उत्तर में दिवोदास-धन्वन्तरि आयुर्वेद की उत्पत्ति, प्रयोजन तथा शल्यतन्त्र आदि अङ्गों को समझाते हैं।

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अथ खलु भगवन्तममरवरमृषिगणपरिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिम् ... सुश्रुतप्रभृतय ऊचुः ॥३॥

— सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय १, सूत्र २–३; शिष्यनामों का मध्यांश संक्षिप्त

अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोऽमराणाम् । शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् ॥२१॥

— सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय १, श्लोक २१

इन वचनों में दिवोदास-धन्वन्तरि अपने को वही आदिदेव बताते हैं जो देवताओं की जरा, रोग और मृत्यु का निवारण करने वाला है तथा शल्यतन्त्र सहित आयुर्वेद के अन्य अङ्गों का उपदेश देने के लिए पुनः पृथ्वी पर आया है। चिकित्सा-परम्परा में आयुर्वेद के आठ अङ्ग—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायन और वाजीकरण—प्रसिद्ध हैं। परन्तु एक पाठगत अन्तर यहाँ स्मरणीय है: हरिवंश और भागवत की राजवंशावलियों में धन्वन्तरि तथा दिवोदास अलग-अलग पीढ़ियों के नाम हैं, जबकि सुश्रुतसंहिता में दिवोदास को ही धन्वन्तरि कहा गया है। इन दोनों ग्रन्थपरम्पराओं का भेद यथावत् रखना ही शास्त्रसम्मत विवेचन है।

काशीखण्ड में धन्वन्तरीश्वर महालिङ्ग, तुङ्गेश्वर और वैद्येश्वरकुण्ड

श्रीस्कन्दमहापुराण के काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ९७ में भगवान् स्कन्द महर्षि अगस्त्य को काशी के असंख्य शिवलिङ्गों, कुण्डों और पवित्र तीर्थों का माहात्म्य सुनाते हैं। उसमें भगवान् महादेव द्वारा भगवती पार्वती को कही हुई तीर्थगाथा का वर्णन है। इसी अध्याय में भगवान् धन्वन्तरीश्वर शिवलिङ्ग और उनसे सम्बद्ध कुण्ड का स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होता है। इससे काशी के साथ धन्वन्तरि-सम्बद्ध तीर्थपरम्परा का प्रत्यक्ष पुराणोक्त प्रमाण प्राप्त होता है।

तत्र स्नानेन दानेन श्राद्धेनाक्षयमश्नुते । धन्वंतरीश्वरं लिंगं कुंडं तन्नाम चैव हि ॥१३७॥ तस्य लिंगस्य नामान्यत्कुंडनामान्यदेव हि । तुंगेश्वरं लिंग नाम कुंडं वैद्येश्वराभिधम् ॥१३८॥ सुधामय्यो महौषध्यः क्षिप्तास्तत्र महाधियः । तत्कुंडस्नानतस्तस्मात्तल्लिंगपरिवीक्षणात् । नश्यंति व्याधयः सर्वे सह पापैः सुदारुणैः ॥१३९॥ तदुत्तरे हलीशेशः सर्वव्याधिनिपूदनः । शिवेश्वरः शिवकरस्तुंगनाम्नश्च दक्षिणे ॥१४०॥

— श्रीस्कन्दमहापुराण, काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ९७, श्लोक १३७–१४०;

इस प्रसंग में भगवान् धन्वन्तरीश्वर नामक शिवलिङ्ग तथा उससे सम्बद्ध कुण्ड का स्मरण करके कहा गया है कि उस शिवलिङ्ग का दूसरा नाम तुङ्गेश्वर और कुण्ड का नाम वैद्येश्वर है। महान् बुद्धिसम्पन्न व्यक्तियों द्वारा उस कुण्ड में अमृततुल्य महौषधियाँ डाले जाने का उल्लेख है। पुराण में उस कुण्ड के स्नान और लिङ्गदर्शन से समस्त रोगों तथा घोर पापों के नाश का माहात्म्य बताया गया है। तुङ्गेश्वर के उत्तर में हलीशेश्वर तथा दक्षिण में शिवेश्वर का उल्लेख तीर्थों की परस्पर स्थिति का संकेत देता है। इस प्रकार धन्वन्तरीश्वर को काशी के शिवायतन-मण्डल से सम्बद्ध एक विशिष्ट आरोग्यतीर्थ के रूप में वर्णित किया गया है।

इस पाठ की व्याख्या में एक आवश्यक सावधानी है। श्लोक १३७ के प्रारम्भ में आए “तत्र स्नानेन दानेन श्राद्धेनाक्षयमश्नुते” शब्द ठीक पहले वर्णित बन्दीकुण्ड के माहात्म्य की निरन्तरता हैं; उसी श्लोक के उत्तरार्ध से धन्वन्तरीश्वर का प्रसंग प्रारम्भ होता है। धन्वन्तरीश्वर-सम्बद्ध कुण्ड के स्नान और लिङ्गदर्शन का स्पष्ट फल श्लोक १३९ में दिया गया है। इसके अतिरिक्त मूल पाठ में महौषधियों को कुण्ड में डालने वालों के व्यक्तिगत नाम नहीं दिए गए हैं और “मृतसञ्जीवनी” नामक किसी विशेष औषधि का भी यहाँ निर्देश नहीं है। अतः उन बातों को मूल श्लोक में जोड़ना उचित नहीं।

काशीखण्ड में वृद्धकालेश्वर और कालोदककूप का आरोग्य-माहात्म्य

इसी अध्याय में धन्वन्तरीश्वर से कुछ पूर्व भगवान् वृद्धकालेश्वर और कालोदक नामक कूप का उल्लेख प्राप्त होता है। उस कूप को सर्वरोगनाशक कहा गया है। काशी की परम्परा में इस प्रसंग की विशेष प्रसिद्धि है।

तदंधोः पूर्वतो लिंगं पुण्यं विश्वेश्वराह्वयम् । विश्वेश्वरस्य पूर्वेण वृद्धकालेश्वरो हरः ॥१२४॥ कालोदो नाम कूपोस्ति तदग्रे सर्वरोगहृत् । यैस्तु तत्रोदकं पीतं स्त्रीभिः पुंभिः स्वकर्मभिः ॥१२५॥ न तेषां परिवर्तोत्र कल्पकोटिशतैरपि । तत्पीत्वा जन्मबंधोत्थाद्भयान्मुच्येत मानवः ॥१२६॥ तत्र कूपे तु यद्दत्तं दानं शिवरतात्मनाम् । संवर्तेपि न तस्यास्ति नाशः कलशसंभव ॥१२७॥

— श्रीस्कन्दमहापुराण, काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ९७, श्लोक १२४–१२७

भगवान् महादेव के कथनानुसार विश्वेश्वर के पूर्व में वृद्धकालेश्वर और उनके अग्रभाग में कालोदककूप स्थित है। उस कूप का जल पान करने से रोग तथा जन्मबन्धनजनित भय दूर होने का पौराणिक फल कहा गया है। वहाँ भगवान् शिव के भक्तों को दान देने की अक्षय महिमा भी वर्णित है। यद्यपि धन्वन्तरीश्वर से सम्बद्ध वैद्येश्वरकुण्ड और वृद्धकालेश्वर से सम्बद्ध कालोदककूप एक ही अध्याय में आए हैं तथा दोनों का रोगनिवारण से सम्बन्ध बताया गया है, तथापि मूल काशीखण्ड इन्हें स्पष्टतः एक ही कुण्ड अथवा कूप नहीं कहता। इसीलिए इनके पृथक् नामों और पाठगत स्थिति को सुरक्षित रखना आवश्यक है।

काशी के दिवोदासेश्वर शिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा और काशीनरेश की कथा

काशीखण्ड के उत्तरार्ध, अध्याय ५८ में काशी के धर्मपरायण राजा दिवोदास की भगवान् विश्वेश्वर में अन्तिम शरणागति तथा उनके द्वारा शिवायतन बनवाने का पावन प्रसंग आता है। राज्यवैभव का उपयोग करके उन्होंने शिवालय की रचना कराई और उसमें भगवान् दिवोदासेश्वर की प्रतिष्ठा की।

आगत्य काशीं मेधावी स भूपालो रिपुंजयः । प्रासादं कारयामास स्वर्धुन्याः पश्चिमे तटे ॥२११॥ रिपून्प्रमथ्य समरे यावती श्रीरुपार्जिता । तावत्या स हि भूपालः शिवालयमचीक्लृपत् ॥२१२॥ दिवोदासेश्वरं लिंगं प्रतिष्ठाप्य रिपुंजयः । कृतकृत्यमिवात्मानममन्यत नरेश्वरः ॥२१४॥

— श्रीस्कन्दमहापुराण, काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ५८, श्लोक २११–२१२ और २१४;

इन श्लोकों के अनुसार दिवोदास, जिन्हें रिपुञ्जय भी कहा गया है, काशी लौटकर गङ्गा के पश्चिमी तट पर एक विशाल प्रासाद बनवाते हैं और अपने राजवैभव को शिवालय-निर्माण में नियोजित करते हैं। दिवोदासेश्वर लिङ्ग की प्रतिष्ठा करने के पश्चात् वे अपने जीवन को कृतकृत्य मानते हैं। अगले श्लोकों में भगवान् शिव के पार्षदों द्वारा उनके दिव्य लोकगमन का पावन वृत्तान्त है। काशीखण्ड की इस कथा को धन्वन्तरि-सम्बद्ध राजवंश के स्मरण से जोड़कर समझा जा सकता है, किंतु दिवोदासेश्वर का प्रत्यक्ष प्रतिष्ठापक यहाँ राजा दिवोदास हैं, धन्वन्तरि नहीं।

नागरखण्ड में धन्वन्तरि द्वारा निर्मित रोगनाशिनी वापी और सूर्यदेव की आराधना

भगवान् धन्वन्तरि के नाम से जुड़ा एक अन्य जलतीर्थ स्कन्दमहापुराण के नागरखण्ड, अध्याय २१२ में प्राप्त होता है। यह काशीखण्ड से अलग क्षेत्रमाहात्म्य है। वहाँ धन्वन्तरि द्वारा निर्मित एक वापी तथा भगवान् सूर्य के प्रति उनके तप और वरप्रार्थना का वर्णन मिलता है।

पश्चिमोत्तरदिग्भागे तस्यास्ति जलसंभवा । धन्वंतरिकृता वापी सर्वरोगविनाशिनी ॥१२॥ तत्र पूर्वं तपस्तेपे धन्वंतरिरुदारधीः । ववन्दे तपसा युक्तो ध्यायमानः समाहितः ॥१३॥ ततः कालेन महता संतुष्टस्तस्य भास्करः । उवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व महामते ॥१४॥ अत्र कुण्डे नरो भक्त्या यः स्नानं कुरुते विभो । तस्य स्यात्सर्वरोगाणां संक्षयः सुरसत्तम ॥१५॥

— श्रीस्कन्दमहापुराण, नागरखण्ड, अध्याय २१२, श्लोक १२–१५

इन श्लोकों में रोगनाशिनी कही गई धन्वन्तरि-निर्मित वापी का वर्णन है। धन्वन्तरि ने वहाँ समाधिस्थ होकर भगवान् भास्कर की आराधना की। वरदाता सूर्यदेव के प्रकट होने पर उन्होंने प्रार्थना की कि उस जलतीर्थ में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वाले मनुष्यों के रोगों का निवारण हो। आगे उसी अध्याय में भगवान् सूर्य उस स्थल के स्नान का विशेष माहात्म्य बताते हैं। परन्तु यह हाटकेश्वरक्षेत्र के अन्तर्गत नागरखण्ड में वर्णित प्रसंग है; इसे काशीखण्ड के वैद्येश्वरकुण्ड के साथ बिना पृथक् प्रमाण के अभिन्न मानना उचित नहीं।

काशी की वर्तमान तीर्थपरम्परा में धन्वन्तरीश्वर और कूप की पहचान

आधुनिक वाराणसी की तीर्थपरम्परा में धन्वन्तरीश्वर का सम्बन्ध दारानगर के श्रीमृत्युञ्जय महादेव मन्दिर-परिसर से बताया जाता है। स्थानीय विवरणों में धन्वन्तरीश्वर का स्थान भवन संख्या के-५२/३९ के समीप निर्दिष्ट मिलता है। वहीं कालोदककूप के आरोग्य-माहात्म्य की भी लोकप्रसिद्धि है। कुछ स्थानीय मान्यताओं में प्राचीन धन्वन्तरि-कुण्ड और कालोदककूप के बीच सम्बन्ध अथवा उनके एकीकृत होने की कथा कही जाती है। किन्तु वर्तमान स्थलपरम्परा के इन विवरणों को मूल काशीखण्ड के स्पष्ट शब्दों से अलग पहचानना चाहिए। पुराण में धन्वन्तरीश्वर-सम्बद्ध कुण्ड का नाम वैद्येश्वर है और वृद्धकालेश्वर के सम्मुख स्थित कूप का नाम कालोदक है। किसी वर्तमान कूप के जल की रोगोपचारक क्षमता की पुष्टि केवल पौराणिक माहात्म्य से नहीं होती; इसका सम्बन्ध श्रद्धा और तीर्थपरम्परा से है।

धनत्रयोदशी का उत्सव तथा नारायणकवच में भगवान् धन्वन्तरि का स्मरण

कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को प्रचलित परम्परा में धनतेरस अथवा धनत्रयोदशी कहा जाता है और इस अवसर पर भगवान् धन्वन्तरि का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। अमृतकलशधारी भगवान् से आयु, आरोग्य और कल्याण की प्रार्थना की जाती है। यह उत्सवपरम्परा व्यापक रूप से प्रचलित है; तथापि भागवत के समुद्रमन्थन-वर्णन के उद्धृत श्लोक ८.८.३१–३५ में उनके प्राकट्य की कोई निश्चित चान्द्र तिथि नहीं दी गई है। श्रीमद्भागवत में नारायणकवच के प्रसंग में भी उनके नाम की महिमा मिलती है।

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा । यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ॥१८॥

— श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध ६, अध्याय ८, श्लोक १८

यहाँ प्रार्थना है कि भगवान् धन्वन्तरि अपथ्य अर्थात् स्वास्थ्य के प्रतिकूल आहार-विहार से रक्षा करें। उसी मन्त्र के शेष भाग में अन्य भगवत्स्वरूपों का स्मरण है। इससे भगवान् धन्वन्तरि की उपासना में भक्ति के साथ विवेकपूर्ण आहार-विहार की महत्ता भी संकेतित होती है।

भगवान् धन्वन्तरि की काशी-सम्बद्ध महिमा का समन्वित पौराणिक स्वरूप

इस प्रकार श्रीमद्भागवत में भगवान् धन्वन्तरि अमृतकलशधारी वासुदेवांश हैं; हरिवंश में वे श्रीविष्णु के वरदान से काशी के राजा धन्व के पुत्ररूप में अवतीर्ण होकर भरद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण करने और उसे आठ भागों में विभाजित करने वाले दिव्य वैद्य हैं; सुश्रुतसंहिता में काशीराज दिवोदास धन्वन्तरि के रूप में शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश करते हैं। काशीखण्ड में धन्वन्तरीश्वर, तुङ्गेश्वर, वैद्येश्वरकुण्ड, वृद्धकालेश्वर तथा कालोदककूप जैसे आरोग्य-माहात्म्ययुक्त तीर्थों के नाम सुरक्षित हैं। अन्य क्षेत्र के नागरखण्ड में धन्वन्तरि की सूर्योपासना और उनकी निर्मित वापी का पृथक् वर्णन मिलता है। सभी ग्रन्थों के अपने पाठभेद और तीर्थपरिचयों का सम्मान करते हुए यही कहना उपयुक्त है कि भगवान् धन्वन्तरि का स्वरूप अमृत, आयुर्वेद, करुणा, प्रजाहित तथा देवोपासना से संयुक्त एक महान् पौराणिक आदर्श है।

समुद्र से प्रकट हुए अमृतपूर्ण कलश के धारक, काशी के राजवंश में अवतीर्ण आयुर्वेद-प्रवर्तक तथा महर्षि सुश्रुत की ज्ञानधारा के परम आदरणीय अधिष्ठाता भगवान् श्रीधन्वन्तरि का श्रद्धापूर्वक स्मरण समस्त प्राणियों के आरोग्य और कल्याण की भावनाओं से संयुक्त है। काशी के पावन तीर्थसमूह में विराजमान श्रीधन्वन्तरीश्वर महादेव तथा उनसे सम्बद्ध वैद्येश्वरकुण्ड का माहात्म्य इस परम्परा को शिवोपासना के आलोक में एक विशिष्ट पौराणिक स्थान प्रदान करता है।


॥ भगवान् श्रीधन्वन्तरये नमः ॥ ॥ भगवान् श्रीधन्वन्तरीश्वराय नमः ॥ ॥ श्रीकाशीविश्वनाथाय नमः ॥


मूल ग्रन्थों के पाठ-सन्दर्भ

श्रीमद्भागवत, ८.८.३१–३५
श्रीमद्भागवत, ९.१७.४
श्रीमद्भागवत, ६.८.१८
हरिवंश, हरिवंशपर्व, अध्याय २९
सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय १
काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ९७
काशीखण्ड, उत्तरार्ध, अध्याय ५८
स्कन्दपुराण, नागरखण्ड, अध्याय २१२

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