Jarasandheshwar
(जरासंधेश्वर)
स्कन्दपुराण : काशीखण्ड
विशालाक्षीश्वरं लिंगं तत्रैव क्षेत्रवस्तिदम् । जरासंधेश्वरं लिंगं तद्याम्यां ज्वरनाशनम् ।। ९७.२४० ।।
तत्पुरस्ताद्धिरण्याक्षलिंगं पूज्यं हिरण्यदम् । तत्पश्चिमे गयाधीशस्तत्प्रतीच्यां भगीरथः ।। ९७.२४१ ।।
विशालाक्षीश्वर लिंग स्वयं वहाँ है और यह काशी में निवास प्रदान करतें है। इनके दक्षिण में जरासंधेश्वर लिंग है और यह ज्वर को नष्ट करते है। इनके (जरासंधेश्वर के) सामने हिरण्याक्ष लिंग है जो स्वर्ण प्रदान करता है। इसकी पूजा की जानी चाहिए। इसके पश्चिम में गयाधीश और आगे पश्चिम में भगीरथ हैं।
स्नात्वा मौनेन चागत्य मणिकर्णीशमर्चयेत् ।। कंबलाश्वतरौ नत्वा वासुकीशं प्रणम्य च ।।१००.७९।।
पर्वतेशं ततो दृष्ट्वा गंगाकेशवमप्यथ । ततस्तु ललितां दृष्ट्वा जरासंधेश्वरं ततः ।।१००.८०।।
भक्त को स्नान के पश्चात चुपचाप लौटकर मणिकर्णिकेश्वर की पूजा करनी चाहिए। तत पश्चात कम्बल, अश्वतर और वासुकिश को प्रणाम करते हैं। फिर उसे पर्वतेश, गंगाकेशव, ललिता और जरासंधेश्वर के क्रम में दर्शन करना चाहिए।
जरासंध
For the benefit of Kashi residents and devotees:-
From : Mr. Sudhanshu Kumar Pandey
Kamakhya, Kashi 8840422767
Email : sudhanshu.pandey159@gmail.com
काशीवासी एवं भक्तगण हितार्थ:-
प्रेषक : श्री सुधांशु कुमार पांडेय
कामाख्या, काशी 8840422767
ईमेल : sudhanshu.pandey159@gmail.com